महाड़, 1927 में डॉ. बी. आर. आंबेडकर द्वारा शुरू किए गए भारत के पहले मानवाधिकार आंदोलनों में से एक की जन्मस्थली है। इस आंदोलन ने जातिगत भेदभाव को चुनौती दी और दलित अधिकारों की रक्षा की। इसने भारत के विचार और उसके संविधान की नैतिकता को भी आकार दिया।
स्वतंत्रता-पूर्व भारत में, महाड़ बॉम्बे प्रांत की एक तहसील और एक महत्वपूर्ण आर्थिक केंद्र था। महाड़ बॉम्बे प्रेसीडेंसी के औद्योगिक क्षेत्र को श्रमिकों की आपूर्ति करता था। महाड़ में, जातिगत भेदभाव बहुत व्याप्त था और उच्च जाति के लोग दलितों के साथ तिरस्कारपूर्ण व्यवहार करते थे।
जातिव्यवस्था का ही परिणाम अस्पृश्यता, यानि छुआछूत भी खूब व्याप्त थी। यह व्यवस्थागत सामाजिक बहिष्कार का एक रूप है जो जाति व्यवस्था की पदानुक्रमिक प्रकृति, यानि ऊँच-नीच की व्यवस्था को और पुष्ट करती है। दलितों के बहिष्कार का आलम यह था कि महाड़ के चावदार तालाब जैसे किसी भी सार्वजनिक तालाब से उन्हें पानी तक पीने का अधिकार नहीं था।
विरासत को समझना
मानवाधिकार और जल-लोकतंत्र के लिए यह आंदोलन अगस्त 1923 में बॉम्बे विधान परिषद में एस.के. बोले द्वारा पारित एक प्रस्ताव से शुरू हुआ। इसमें कहा गया था, “परिषद सिफारिश करती है कि अछूत वर्गों को भी उन सभी धर्मशालाओं, सार्वजनिक जल-स्थानों तथा सार्वजनिक स्कूलों, अदालतों, कार्यालयों और औषधालयों का उपयोग करने की अनुमति दी जाए, जिनका निर्माण और रखरखाव सरकार द्वारा नियुक्त या क़ानून द्वारा स्थापित निकायों द्वारा सार्वजनिक धन से किया जाता है।”
इस प्रस्ताव ने ब्राह्मणवादी प्रभुत्व को चुनौती दी और इससे महाड़ के पास गोरेगांव और दासगांव जैसे इलाक़ों में सामाजिक परिवर्तन के प्रयासों को काफी प्रेरणा मिली। 1926 में, चंभार जाति के एक नेता रामचंद्र चांदोरकर ने गोरेगांव में एक सार्वजनिक जलाशय में छलांग लगा दी, जिससे ग्रामीणों द्वारा अछूतों (चंभारों और महारों) की संपत्तियों पर हमले भड़क उठे। दासगांव में, ‘महार समाज सेवा संघ’ सक्रिय था, जिसका उद्देश्य समानता के लिए दलित वर्गों को एकजुट करना था।
इससे जुड़े चांदोरकर, आरबी मोरे, रामजी पोतदार और अन्य लोगों ने दासगांव की एक स्थानीय झील और कई कुओं से पानी पिया। कम्युनिस्ट आरबी मोरे के संस्मरण में इस बात पर प्रकाश डाला गया है कि कैसे यह क्षेत्र अछूतों के अधिकारों को बहाल करने की मांग करते हुए, समता और समानता के लिए आंबेडकर के संघर्ष का समर्थन करने के लिए उत्सुक था।
इसके अतिरिक्त, यह क्षेत्र गोपालबाबा वलंगकर, एनएम जोशी, संभाजी गायकवाड़ जैसे अनेक बड़े कार्यकर्ताओं की जन्मभूमि होने के लिए भी प्रसिद्ध था।
महाड़-1.0 और महाड़-2.0
डॉ. आंबेडकर और उनके अनुयायियों ने 19-20 मार्च, 1927 को 1923 के बोले प्रस्ताव के अनुसार अछूतों के पानी पीने के अधिकार की माँग करते हुए एक सत्याग्रह किया।
आंबेडकर के अनुयायी अपने अधिकारों की माँग के लिए अपने नाममात्र के सामान, खाली पेट और लाठियों के साथ इस कार्यक्रम में उमड़ पड़े (ये लाठियां महार लोग पारंपरिक रूप से अपने साथ रखते थे)। हालांकि, स्थानीय लोगों ने सत्याग्रहियों को पानी देने से मना कर दिया; इसलिए, इस उद्देश्य के लिए विशेष रूप से उनसे 40 रुपये का पानी खरीदना पड़ा।
महाड़ प्रथम सत्याग्रह के बाद, शुद्धीकरण अनुष्ठान किए गए, क्योंकि डॉ. आंबेडकर और उनके अनुयायियों ने उस जल को छुआ और पिया था। इन अनुष्ठानों का उद्देश्य मानवाधिकारों पर जाति व्यवस्था की वरीयता को स्थापित करना था।
परिणामस्वरूप, डॉ. आंबेडकर ने 25 और 26 दिसंबर, 1927 को दूसरा महाड़ सम्मेलन आयोजित करने की योजना बनाई। इस बीच, अदालतों ने बहिष्कृत लोगों के लिए चावदार तालाब का पानी पीने पर रोक लगाने का स्थगन आदेश यह बताते हुए जारी कर दिया कि इस तालाब का स्वामित्व सार्वजनिक नहीं, बल्कि निजी था।
इसी दौरान, डॉ. आंबेडकर ने अपना पाक्षिक प्रकाशन, बहिष्कृत भारत , शुरू किया, जिसमें मानवाधिकारों पर ज़ोर देते हुए लोकतांत्रिक सच्चाइयों और आदर्शों पर चर्चा की जाती थी। उन्होंने महाड़ की घटना के बाद दलितों पर हुए हिंसक हमलों के बाद, नवंबर 1927 में डॉ. पंजाबराव देशमुख द्वारा शुरू किए गए अंबाबाई मंदिर सत्याग्रह में भी भाग लिया। इन हमलों को देखते हुए दलितों की सुरक्षा के लिए आंबेडकर सेवा दल का गठन हुआ।
चूँकि चावदार तालाब का मामला अभी भी लंबित था, इसलिए डॉ. आंबेडकर ने अपने अनुयायियों से परामर्श करने के बाद सत्याग्रह शुरू न करने का निर्णय लिया। हालांकि, 25 दिसंबर को, उन्होंने गंगाधर सहस्रबुद्धे, राजभोज और थोराट के प्रस्ताव के बाद मनुस्मृति का दहन किया। महाड़-2.0 में, उन्होंने विशेष रूप से महिलाओं को संबोधित किया और इस बात पर ज़ोर दिया कि मानवाधिकारों में लैंगिक समानता भी शामिल होनी चाहिए।
महाड़ क्रांति
डॉ. अम्बेडकर ने कहा कि महाड़-1.0 और महाड़-2.0 सत्याग्रहों में फ्रांसीसी क्रांति की युगचेतना समाहित थी। महाड़ सत्याग्रह के दौरान डॉ. आंबेडकर अपने भाषणों में गरिमा और आत्म- सम्मान के प्रबुद्ध लोकाचार का प्रचार करते हैं। महाड़-2.0 में, डॉ. आंबेडकर 1798 की फ्रांसीसी राष्ट्रीय सभा की चर्चा करते हैं। ये दो ऐतिहासिक घटनाएँ, जिन्होंने दो युगों, महाड़-1.0 और -2.0 को परिभाषित किया, भारत के विचार और उसके संविधान की नैतिकता को आकार देने में सहायक रहीं।
हालांकि, फ्रांसीसी क्रांति ने अपने अधिकारों के विचार में महिलाओं को शामिल नहीं किया था। इसीलिए यह क्रांति उनकी राष्ट्रीय सभा और उसके आगे के विकास में महिलाओं की शारीरिक और मानसिक भागीदारी के अभाव में ठोस समतावाद को आधार नहीं बना सकी। यह तो आगे चलकर मैरी वोलस्टोनक्राफ्ट का हस्तक्षेप था जिसने अपने पैम्फलेट “महिलाओं और नागरिकों के अधिकारों की घोषणा” के माध्यम से फ्रांसीसी क्रांति में महिलाओं के बहिष्कार और स्थान पर सवाल उठाया।
डॉ. आंबेडकर ने अपने 1916 के शोधपत्र में जातियों की एक नई लैंगिक समझ का प्रस्ताव रखा था। उन्होंने भारतीय समाजशास्त्रियों के उस दृष्टिकोण पर प्रश्नचिह्न लगाया जिसमें वे जातिव्यवस्था के मुद्दे के मूल को समझने में असमर्थ थे। दरअसल स्त्री को स्त्री बनाने और बनाये रखने के लिए उनके विवाह, प्रजनन, पवित्रता और यौन नियंत्रण को लेकर लागू की जाने वाली नियमावली पर ही जातिव्यवस्था टिकी हुई थी।
इसे न समझ पाने के चलते भारतीय समाजशास्त्री स्त्री-प्रश्न और जाति-प्रश्न को एक दूसरे से असंबद्ध टुकड़ों के रूप में देखते थे। वास्तव में जातिव्यवस्था का समाधान केवल लैंगिक साधनों से ही प्राप्त किया जा सकता है। महाड़-1.0 के भाषणों और कार्यों में महिलाओं और पुरुषों की भागीदारी पर जोर है, चाहे उनका लिंग, भूगोल, वर्ग और जाति कुछ भी हो।
वे वहाँ राष्ट्रीय सभा के रूप में इसलिए एकत्रित हुए थे ताकि थोपे गए ब्राह्मणवादी आधिपत्य से मुक्त हो सकें और अपना रास्ता खुद तय कर सकें, ठीक वैसे ही जैसे फ्रांस में राजा लुई सोलहवें द्वारा अनुमति न दिए जाने के बाद वहां के जनसाधारण वर्ग (थर्ड एस्टेट) ने टेनिस कोर्ट की शपथ के दौरान किया था।
महाड़-2.0 में पारित प्रस्ताव पहली नजर में इसलिए महत्वपूर्ण लगता है क्योंकि वह शूद्रों पर होने वाले अन्याय की ओर संकेत करता है। लेकिन गहराई से देखने पर मनुस्मृति के सिद्धांतों और उस ऐतिहासिक काल की सामाजिक धारणाओं को समझने से पता चलता है कि मनुस्मृति महिलाओं को भी शूद्र के समान समझती थी। इसलिए जो अन्याय शूद्रों पर था, वह महिलाओं पर भी था, और कई बार महिलाएँ उससे भी अधिक दमनकारी नियमों के तहत रखी गईं।
आधुनिक साहित्य और इतिहास में इसके बहुत सारे प्रमाण मिलते हैं।
महाड़-2.0 में डॉ. आंबेडकर के कार्य, विशेष रूप से मनुस्मृति को जलाना और महिलाओं की सभा को संबोधित करना, मानव अधिकारों पर एक नए विमर्श को सामने लाने का प्रयास करते हैं, जिसके स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व के सिद्धांत अहिंसक बौद्ध धर्म से प्राप्त हुए हैं।
डॉ. आंबेडकर ने एक ऐसे लिंग-आधारित राष्ट्र की नई अवधारणा प्रस्तुत की जिसका प्रबुद्ध राष्ट्रवाद मूलतत्ववाद (यानि, जाति, धर्म, जन्म, परंपरा या स्थायी पहचानों) पर नहीं, बल्कि अस्तित्ववाद (यानि, जीवन, शरीर, गरिमा, अधिकारों और स्वतंत्रता) से बनता है, जो जनता के शरीर और उनके प्राकृतिक, वैध मानवाधिकारों में निहित होता है। यानि उन्होंने एक “लैंगिक राष्ट्र” (जेंडर्ड नेशन) का विचार दिया, जहाँ महिलाओं की स्वतंत्रता और समानता राष्ट्रवाद का अनिवार्य हिस्सा है।
इस प्रकार, 25 दिसंबर को भारत में भारतीय महिला मुक्ति दिवस के रूप में भी मनाया जाता है, क्योंकि डॉ. आंबेडकर का यह कदम स्त्री-स्वतंत्रता के इतिहास में एक क्रांतिकारी मोड़ था। यह केवल एक किताब का विरोध नहीं था, बल्कि सदियों पुरानी पितृसत्तात्मक मानसिकता को चुनौती देना था।
यह आंदोलन जिस एकमात्र मूलतत्ववाद को स्वीकार करता है, वह जाति आधारित या धार्मिक नहीं, बल्कि मानवीय है। वह माणुसकी (यानि, मनुष्य होने का सार—मानवता, करुणा, समानता) तथा मैत्री (यानि, करुणामय मित्रता जोकि बौद्ध धम्म का एक मुख्य मूल्य है) पर आधारित है। इस पर आधारित लोकतंत्र महज शासन व्यवस्था नहीं है, बल्कि एक जीवन-शैली है।
यह महाड़ सत्याग्रह के दौरान सीखी गई नैतिकता है, जो संवैधानिक नैतिकता की नींव है, और जिसे भारत के संविधान में संस्थागत रूप दिया गया है।
(निखिल संजय और रेखा अडसुले का लेख ‘द हिंदू’ से साभार। अनुवाद : शैलेश।)